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Monday, May 5, 2008

प्रियंका की नलिनी से मुलाकात

कुछ दिन पहले मैं बिस्तर पर पड़े पड़े कुछ न्यूज देख रही थी अचानक एक न्यूज ने मेरा ध्यान खींचा। प्रियंका वाड्रा, अपने पिता राजीव की हत्या मी शामिल होने के चलते सजा काट रही नलिनी से जेल मे मिलने गई। रिपोर्टर्स तो तमाम कयास बाजी और रिपोर्ट्स के बाद चुप हो गए पर मैं सोचती रही।
इस न्यूज ने मुझे इतना न हिलाया होता अगर मैं ये न देखती की प्रियंका नलिनी के साथ बैठने के बाद देर तक रोती रही और फ़िर नलिनी और प्रियंका साथ साथ रोती रहीं। शायद ये वो दर्द है जो अभी तक नही निकल पाया होगा और प्रियंका का भी और नलिनी का भी।
शायद रोने से उस दर्द में कुछ कमी हुयी हो। रोने से जी हल्का हो जाता है न।
वो न्यूज देखते हुए और उसके बाद भी कई बार मैं भी बार बार रोई।
पता नही क्यों!

Saturday, February 23, 2008

मन्दिर

अपने देश मी न रहने से कई प्रोब्लम्स होती हैं। मनपसंद चीजें नही मिलती- खाने की , देखने की और पता नही क्या क्या होता है जो छूट जाता है।
कई दिन मन करता है किसी मन्दिर जाने का, जैसे हनुमान जी का मन्दिर ! हर कही मिल जाता है भारत में, बस घर से निकलो और मन्दिर सामने। क्यूट से हनुमान जी खूब सारा लाल रंग पोते मुंह उठाये मिल जायेंगे। झट-पट हनुमान चालीसा या और जो कुछ आता है पढ़ डालो और मन्दिर का इनाम- प्रसाद लो और चलते बनो। क्या मजे होते हैं अपने घर रहने पर। अब पूरी दुनिया में तो गली-गली में मन्दिर मिलने से रहा।
मेरे दादाजी, हमारे गाँव के मन्दिर के पुजारी थे। मन्दिर क्या था, छोटा सा घेरा था जिसमे एक हनुमान जी की छोटी सी मूर्ति थी। हम सब पापा के साथ रहते थे पर दादाजी हमेशा गाँव ही रहे। उस मन्दिर मी बड़ी खास बात थी। वहाँ लोग मनौती मानते थे और पूरी होने पर या और खुशी के मौके पर हनुमान जी को वस्त्र चढाते थे। वो वस्त्र वास्तव मे कागज एक एक टुकड़ा होता था। जब मैं समझदार हुई तो मुझे बड़ा अजीब लगता था कि हनुमान जी को चढाना ही है तो कपड़े का वस्त्र क्यों नही चढाया जाता, कागज का टुकड़ा क्यों? मैं जब भी दादा जी से पूछती तो वो टाल देते थे। आखिर एक दिन उन्होंने बताया जब मैं वास्तव में कारण समझने लायक हो गई थी तब।
उन्होंने बताया कि मन्दिर मे अपनी खुशी मे कुछ चढाना सभी का हक़ होता है और जरुरी नही कि जो खुश हों उनके पास पैसे भी हों और अगर पैसे भी हों तो छोटे से गाँव मे अधिकतर गरीब आबादी मे कपड़े चढाना हो सकता है किसी के वश मे न हो तो वो क्या करेगा? भगवान् के आगे तो सभी बराबर होते हैं । लोगो की भेट भी बराबर ही रहे इसलिए कागज के कपड़े पहनते हैं भगवान्।
मुझे हरिवंश राय बच्चन जी कि एक कहानी याद आती है, छोटी सी है- दो बहने थीं चुन्नी और मुन्नी । चुन्नी तीसरी में पढ़ती थी और मुन्नी दूसरी में। चुन्नी ने मनौती मानी कि अगर वो पास हुयी तो हनुमान जी को एक रुपये का प्रसाद चढाएगी , तो मुन्नी ने भी वैसे ही मनौती मान ली। चुन्नी तो पास हो गई पर मुन्नी नही। मां ने चुन्नी के लिए प्रसाद मँगवाया। जब वो प्रसाद चढाने जाने लगी तो मुन्नी भी ललचाई उसने मुंह गिरा के मां से पूछा कि मां जो पास नही होते वो प्रसाद नही चढा सकते? मां को प्यार आ गया उसने मुन्नी के लिए भी प्रसाद मंगवा लिया।
जब मुन्नी प्रसाद चढा रही थी तो चुन्नी के मुंह पर ईर्ष्या का, मां के मुंह पर कौतुक का, मुन्नी के मुंह पर आह्लाद का और हनुमान जी के मुंह पर झेंप का भाव था।
ये कहानी पढने के बाद जब मैं मन्दिर जाती थी तो हनुमान जी को देखते ही हँसी आ जाती थी। एक बार तो मैंने भी मनौती मानी। मेरी भी मनौती नही पूरी हुयी। अब मां तो थीं नही प्यार करने को तो मुझे ही ख़ुद पर प्यार आ गया और मैंने हनुमान जी को पूरे ११ रुपये का प्रसाद चढा दिया और ये सोच के खुश होती रही कि वो बेचारे कितना झेंपे होंगे।
अब तो भगवान् से कुछ मांगती नही जल्दी जानती हूँ कि आज इंसान इतना लालची हो गया है कि भगवान् बेचारे ख़ुद नाराज रहते होंगे कहीं मुझ पर ही न झल्लाहट निकाल दे।
भगवान् जी मजाक था बुरा मत मानिएगा!

Monday, February 18, 2008

पलाश का फूल

एक दोस्त के ब्लॉग पर पलाश के फूल पर कविता पढ़ने को मिली तो मन किया कुछ लिखना चाहिए।
पलाश के फूल से पहला परिचय, आज सोचती हूँ तो हंसी आती है. बहुत पहले की बात है. एक दिन हम कुछ दोस्त एक गेम खेल रहे थे जिसमे हमे कुछ गेस करने होते थे. मुझे जिसके बारे मे गेस मारने थे, उसका पसंदीदा फूल पलाश का फूल था और तब तक मुझे पता ही नही था की ये चीज़ क्या होती है. मेरा गेस ग़लत निकला. मैने ये मानने से मना कर दिया की ऐसा कोई फूल होता भी है तो उसने एक कविता की लाइने बतायीं
आए महंत बसंत
किंशुक छत्र लगा बाँध पाग पीला
मै थोड़ा फ्र्स्टू टाइप की थी मुझे लगा की उसने मुझे ग़लत गेस करने के लिए ही पलाश का फूल चुना था. मै उससे जम कर गुस्सा हुई और कई दिन तक बात नही की।
काफ़ी दिन बाद मुझे खुद ही अपना गुस्सा भूलना पड़ा, क्योंकि उसने मेरे गुस्से को नोटिस ही नही किया।
बहुत दिन बाद जब उसे बताया की मै उससे इस बात को ले कर गुस्सा थी तो उसने बड़ी मासूमियत से कहा की अब कभी गुस्सा होना तो प्लीज़ बता देना की तुम गुस्सा हो नही तो हमे पता ही नही चल पाएगा।
उसके बाद आजतक जब किसी को ये फूल पसंद करते हुए सुनती हूँ तो हँसी आती है खुद पर।
जब किसी की कोई पसंद अनोखी होती है तो लगता है की ये ही पसंद क्यों. किसी को पलाश का फूल पसंद है तो ज़रूर इसके पीछे कोई वजह होगी. हमारी कुछ उम्र ही ऐसी थी की हम गेस करते थे की कुछ इश्क-विश्क जैसा मामला होगा. हमने बहुत कोशिश की पता लगाने की लेकिन एक चुप तो हज़ार चुप. कभी पता ही नही लगा की आख़िर क्या कोई ऐसा मामला था।
उसकी इस फूल की दीवानगी अभी तक है और उसके जन्म दिन के दिनो मे ही पलाश का फूल खिलता है मज़े की बात है की वो इकट्ठा करता है ढेर सारे फूल अभी तक.